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महिला एवं बाल अपराध राजस्थान पुलिस PDF and notes part-6
📕बालश्रम (निषेध एवं नियमन) संशोधन अधिनियम, 2016 के अनुसार बच्चों को दो श्रेणियों में बांटा गया हैः-
एक ऐसा व्यक्ति, जिसने 14 वर्ष की आयु पूरी नहीं की हो, 14 वर्ष तक की आयु के किसी भी बच्चे को कहीं भी रोजगार पर नहीं लगाया जा सकता है।
एक ऐसा व्यक्ति, जिसने 14 वर्ष की आयु पूरी की हो, लेकिन 18 वर्ष की आयु पूरी नहीं की हो, ऐसे बालक को किसी भी खतरनाक६ जोखिम वाले व्यवसायों या प्रक्रियाओं में काम पर नहीं लगाया जाना चाहिए और खतरनाक कार्य करने की अनुमति भी नहीं देनी चाहिए ।
बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 के धारा (बी) के तहत यदि कोई विवाहित जोड़े में से कोई भी एक नाबालिग है, तो इसे बाल विवाह माना जाता है। 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की और 21 से कम उम्र के लड़के को इस अधिनियम के तहत नाबालिग माना गया है। इसका अर्थ है कि विवाह की न्यूनतम कानूनी आयु लड़की के लिए 18 और लड़के के लिए 21 वर्ष है।
केन्द्र सरकार द्वारा 1929 के बाल विवाह निषेध अधिनियम को निरस्त करके और उसके स्थान पर 2006 में अधिक प्रगतिशील बाल विवाह निषेध अधिनियम लाकर हाल के वर्षों में इस प्रथा को रोकने की दिशा में काम किया गया है। इसके अंतर्गत उन लोगों के खिलाफ कठोर उपाय किये गये हैं जो बाल विवाह कि इजाजत देते हैं और उसे बढ़ावा देते हैं। यह कानून नवम्बर 2007 में प्रभावी हुआ |
इस कानून के अनुसार, जो कोई भी व्यक्ति, अठारह वर्ष से अधिक आयु का पुरुष वयस्क होते हुए, बाल-विवाह करेगा, वह, कठोर कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्मने से, जो एक लाख रुपए तक का हो सकेगा, अथवा दोनों से, दंडनीय होगा। जहां कोई बालक बाल-विवाह करेगा, वहां ऐसा कोई व्यक्ति जिसके भारसाधन में चाहे माता-पिता अथवा संरक्षक या किसी अन्य व्यक्ति के रूप में अथवा अन्य किसी विधिपूर्ण या विधिविरुद्ध हैसियत में, बालक है, जिसके अंतर्गत किसी संगठन या व्यक्ति निकाय का सदस्य भी है, जो विवाह का संवर्धन करने के लिए कोई कार्य करता है या उसका अनुष्ठापित किया जाना अनुज्ञात करता है या उसका अनुष्ठान किए जाने से निवारण करने में उपेक्षापूर्वक असफल रहता है, जिसमें बाल-विवाह में उपस्थित होना या भाग लेना सम्मिलित है, कठोर कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा और जुर्माने से भी, जो एक लाख रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा परंतु कोई स्त्री कारावास से दंडनीय नहीं होगी |
📕यौन शोषण से बच्चों की सुरक्षा का अधिनियम ( पोकसो एक्ट), 2012-
बालकों के प्रति बढ़ते हुए अपराधों के समुचित उपचार एवं नियंत्रण के लिए लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (पोकसो एक्ट) लाया गया। 4 नवम्बर, 2012, लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012, (पोक्सो एक्ट) लागू किया गया। इस कानून में बच्चों के हित को ध्यान में रखते हुए पुलिस के स्तर पर शिकायत दर्ज कराने तथा न्यायायिक प्रक्रिया को बाल मैत्रीपूर्ण बनाने का प्रयास किया गया है । इस कानून के द्वारा न सिर्फ बच्चों के प्रति होने वाले कई तरह के यौन ,/ लैंगिक अपराधों को कानून के दायरे में लाया गया है, साथ ही इन अपराधों के लिए सख्त सजा का प्रावधान किया गया है। इनमें प्रमुख रूप से बच्चों के प्रति यौन हमला, यौन शोषण / उत्पीड़न, अश्लीलता, गोपनीयता आदि को शामिल किया गया है। बच्चों के प्रति होने वाले यौन अपराधों के प्रति माता-पिता, स्कूल, को-पड़ोसी, स्वास्थ्यकर्मी, पुलिस, मीडिया, सामाजिक एवं सरकारी संगठनों की महत्तवपूर्ण भूमिका है। सामुदायिक स्तर पर इनके सामुहिक प्रयास के बिना अपेक्षित परिणाम लाना चुनौतीपूर्ण है
📕प्रवेशन लैंगिक हमला (धारा 3) :-
- एक व्यक्ति जब अपना लिंग किसी भी सीमा तक किसी बच्चे की योनि, मूंह, मूत्रमार्ग या गुदा में प्रवेश करता है या बच्चे से उसके साथ या किसी अन्य व्यक्ति के साथ ऐसा करवाता है या
- किसी वस्तु या शरीर के ऐसे भाग को, जो लिंग नही है, किसी सीमा तक बच्चे की योनि, मूत्रमार्ग या गुदा में डालता है या बालक से उसके साथ या किसी अन्य व्यक्ति के साथ करवाता है या
- बालक के लिंग, योनि, गुदा या मूत्रमार्ग पर अपना मूंह लगाता है या ऐसे व्यक्ति या किसी अन्य व्यक्ति के साथ बालक के साथ ऐसा करवाता है।
📕प्रवेशन लैंगिक हमला (धारा 4) :-
- जो कोई प्रवेशन लैगिक हमला करेगा वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि 7 वर्ष से कम की नहीं होगी किन्तु जो आजीवन कारावास तक हो सकेगी दण्डित किया जायेगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा |
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